छत्तीसगढ़ी कहिनी: जस बड़े बाबू तस बड़े दाई

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बुढ़ापा म दवई घलो बने काट नइ करे. बबा अब दवई ल देख के चमक जथे. जवानी हवा होय के बाद बुढापा म दवा सहारा होथे. फेर बबा चेम्मर जीव आय. खाय-पिए ल घलो तियाग देथे. अइसन म अपनों देहें अपने ल नइ सुहाय. बबा किथे अब तो मेंहा केवल प्रभू किरपा ले जियत हवंव. परमात्मा कब बला लिही कोनो नइ जानय. बबा ह धीरे धीरे सब मोह माया ल छोड़त जात हे.

अन्नपूर्णा माई
फगनी दाई ल गुजरे यही कोई चार बरस होगे. दाई के जियत ले बबा खूब टंनक रिहिस हे. खाना-पीना सब चोक्खा राहय. दाई एको आखर पढ़े लिखे नइ रिहिस फेर पाक कला म एकदम निपूर्ण राहय. उनकर घर सगा-सोदर ल लेके साहेब-सुभा, नेता, मास्टर, पटवारी सब के आना-जाना लगे राहय. दाई खुशी-खुशी म घर म जोंन खाय पिए के चीज राहय ओला खवा पिया के उनकर सुआगत करे. जेन दाई के रसोई (रंधनी खोली के खाना) के बने चीज खांय वो अपन अंगरी चांटत रहि जाय. अतेक स्वादिष्ट भोजन बने के सब खूब तारीफ़ करें. सचमुच दाई संउहत अन्नपूर्णा माई रिहिस. इही नहीं ओ हर बहादुर घलो रिहिस. एक बखत घर म चोर घुसरिस त दाई ओखर अइसे मरम्मत करिस के ओ हा परान बचा के भागिस.

गहरा गियान
बबा बड़े बाबू के नाव ले अतराब म प्रसिद्ध राहय. पहली बीएसपी म नौकरी करिस. वुहाँ ले रिटायर हो के नगर पंचायत के बड़े बाबू के पद म काम करे. देह ऊँचपुर कद काठी हट्टा-कट्टा तंदरूस्त रिहिस. शुद्ध खादी के टिनोपाल/उजाला डलाय सफेद चमचमावत धोती-कुरता म अउ पाँव म चमड़ा के पनही पहिने राहय. जब बड़े बाबू घर ले निकले त देखउल हो जाय. चलय त अइसे लगय जानो मानो कोनो हाथी मदमस्त होके बस्ती म रेंगत हे. बड़े बाबू आज के बड़े बाबू कस नइ रिहिस. ओखर गियान खूब गहरा रिहिस. खाय-पिए म चोक्खा, अंगरेजी बोले अउ पढ़े लिखे म चतुरा. कानून के अच्छा जानकार अउ गुरू गंभीर व्यक्तित्व के धनी. बड़े बाबू के लिखा ल कोनो अधिकारी कभू काटिस होही अइसे सुने अउ देखे नइ गिस. सुबह शुद्ध घी से सेंकाय पूरी अउ बदाम के हलुआ के नाश्ता ओखर रोज निश्चित राहय. तब सस्ता के जमाना रिहिस. बाबू साहेब सब बर आदरर्णीय रिहिस. व्इसने दाई घलो मजबूत इरादा वाली निडर अउ समझदार महिला. दुनों के जुग-जोड़ी देखते बने. ठाकुर साहेब लछमन सिंह नाव ले आगू बड़े बाबू जादा सुनाय.बड़ उधार अउ दयालु रिहिस. घर क्र नौकरानी फुलवा रोजे बड़े बाबू घर दुनो जुआर खाय अउ कमाय.

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मध्य प्रदेश

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बड़े बाबू के व्यक्तित्व अउ ओखर प्रतिभा के सब कायल राहंय. प्रदेश के कइ मंत्री बड़े बाबू से मिलना अउ विचार-विमर्श करना जरूरी समझ के उनकर घर पहुंचे. ये वो समे रिहिस जब गुनी मनखे के सबे कदर करें. बड़े बाबू म कोनो बुरा आदत नइ रिहिस. अउ दाई ल पूरा मोहल्ला ‘बड़े-बाई’ के संबोधन से सम्मान देंय. बड़े बाबू सब के छोटे बड़े समस्या ल हल करे. कतको झन मन बड़े बाबू के लगाय मास्टर, पटवारी. ग्राम-सहायक हो के रिटायर होगें. वो समे म प्रशासन म सही आदमी के बड़ मान राहय. आज सरिख भ्रष्टाचार के हाहाकार नइ रिहिस.

बड़े बाबू अउ दाई के सुरता करत बबलू के आँखी ले आंसू झरत राहय. अपन घर के कोंटा म उंकर फोटू ल धरे-धरे किकिया के रोये जाय, बस रोये जाय. ओखर गला भरभरागे. बबलू ल रोवत देख के ओखर माँ राही बाई घलो रोवन लागिस. बबलू के बहुरिया ल ये सब देख के कुछ समझ नइ अइस. ओहा बोक बाय देखत रहिगे. राही बतइस के बबलू ल नानपन ले बड़े बाबू अउ दाई अपन सन्तान बरोबर पाले-पोसे रिहिस. ओखर पढ़ई लिखई मेट्रिक पास करत ले उनकरे घर म बितिस. अपन औलाद बरोबर बबलू के हर इच्छा, संउख अउ सपना ल पूरा करिन. हमर परिवार मरार पारा म रिहिस. अउ बड़े बाबू मन नवापारा म रहँय. बबलू कालेज पढ़े बर रायपुर चल दिस. उन दुनों सियान होगें. उन ल सहारा के जरूरत परिस. उन सहर के घर ल बेच के अपन भतिज के गाँव म बसगें. बबलू के संपर्क टूटगे. उनकर तबियत म उतार-चढाव शुरू होइस कुछ बरस बितिस, पहिली दाई ओखर बाद बड़े बाबू बैकुंठवासी होगें. आज पूरा दस बरस होगे. ममतामयी दाई ल गुजरे. बबलू ओखरे सुरता म रो परिस. ओखर मन के संग बिते समे चलचित्र बरोबर मन के आँखी म घुमगे.

बुढापा के आसरा के आस
बड़े बाबू जब रिटायर होइस तब बचन दाई(बड़े बाबू की पत्नी) ह बबा ल किहिस- अब बुढ़ापा म सहर छोड़ के तिर तार के गाँव म बसे जाना चाही. बबा किहिस-अइसे करथन ये नवापारा के घर ल बेच देथन.

पइसा रइही त रिश्तेदार मन सुख दुःख म हमर मन के परवाह करहिं. तोर भाई भतिज मन त दिल खोल के बलावत हें. बचन दाई झट किहिस-हाँ, घर बेच के मोर मइके म घर ले लव. वुहाँ मोर भतिज मन सेवा करहीं. इहाँ त मरे परे रहिबो तभो ले कोन देखइया हे? बबा मकान बेच के सहर से कुछ किलोमीटर दूरिहा गाँव म घर ले लिस. अउ वुहें बसगें. बड़े बाबू के एको संतान नइ रिहिस. संतान सुख उन खूब तरसींन. एक दु झन लइका मन ल सालों-साल रखिस घलो. पढ़-लिखके उन अपन दाई-ददा तिर चल दिन. नि:संतान बड़े बाबू अउ दाई कुछ साल गाँव म अपन भाई-भतिज के आश्रय म दिन बिताइंन. बड़े बाबू ह बड़े बाई के मइके गाँव म रेहे के संकलप ल पूरा करिस. खुद अपन ससुरार म रहे बर कनुवात रिहिस फेर बुढ़ापा म अपन पत्नी के मन ल राखे बर गाँव म जा बसिन. बस्ती म एक चुलहा अउ बाढ़गे. रिश्तेदार मन सुरूआत म दुनों के बने देखरेख करिन.

बेसहारा अउ निरमोही
साल भर बाद बड़े बाई के भाई-भतिज मन जायजाद के मोह जागगे .बड़े बाई के तबियत अचानक अइसे बिगड़ीस के सुधर नइ पइस. बिस्तरा म परे-परे दिन कटे. शरीर कमजोर होगे. अउ ओ हा अपन परान तियाग दिस. जोंन अपन जीवन म कठोर से कठोर व्रत के कड़ाई से पालन करे, कभू दुसर के सहारा नइ लिस, माँ दुरगा के अखंड भक्तिन रिहिस ओ बुढ़ापा म बेसहारा बरोबर अपन तन तियागिस. बड़े बाबू उदास रेहे लगिस. अकेल्ला परगे. धीरे-धीरे ओखरो तबियत बिगड़ना शुरू होइस.जीवन भर शान-मान के जिनगी जियत-जियत अब बड़े बाबू एकदम बेसहारा अउ निरमोही होगे. धीरे-धीरे सब तियाग करत गिस. इहाँ तक के दवा लेना घलो छोड़ दिस. ओखर कोनो पूछइया नइ रिहिस. एक दिन बड़े फजर गाँव के मन देखिन बड़े बाबू के सांस उखड़गे हे. अपन दसना (बिस्तर) म चित परे हे. तन-मन माटी म मिलगे. बड़े बाबू अपन माँ बाप के अकेल्ला बेटा रिहिस. ओखर ले बड़े एक झन बहिनी रिहिस. दु बहिनी अउ रिहिंन जेन अपन घर संसार म रिहिंन. खबर पा के उन दउड़े-दउड़े अइंन तब तक बड़े बाबू के सब किरिया करम होगे. तेरही होय के पहिली उनकर पूरा चल-अचल संपत्ति घर दुआर, रूपिया पइसा जेवर, बर्तन-भाड़ा, बड़े बाई के भतिज मन के होगे..बड़े बाबू के घर सहर म सबे रिश्तेदार मन के रुके के स्टेशन राहय. सुखके सब साधन के उपभोग करें. ओखर मरे के छह महीना बाद बबलू ल खबर मिलिस के बड़े बाबू नइ रिहिस. बबलू के माँ-बाप मन मार के रही गिन.

(शत्रुघन सिंह राजपूत छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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