छत्तीसगढ़ी म पढ़व: तोर मया धर खाये हे मालिक…!

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ओकर बेटा मन बने सब कारोबार ल देखत हे. ओकर बेटा मन घलो बंटवारा कर डरे हे चीज बस के अउ अलग-अलग रहिथे, खात-कमावत हे बने. पोठ मालगुजार रिहिन हे फेर बंटवारा मं सब छर्री-दर्री होगे हें. ट्रेक्टर, जीप, घोड़ा, गाड़ी, मील, सोना-चांदी भरपूर रिहिसे फेर ये सत्यानाश होवय बंटवारा के ये अइसे महामारी, कोरोना अउ कैंसर जइसे बीमारी हे के छत्तीसगढ़ मं कोनो घर, कोनो मनखे ल नइ छोडय़. सियान मन बताथें- बंटवारा राष्ट्रीय बीमारी हे, आपदा हे, अछूत हे. भारत-पाकिस्तान के बंटवारा के दुख आज ले पेरत हे. न उही मन सुख के रोटी खा सकत हे न एमन. का होही तउन ला भगवान जानय.

बहुत दुखदायी होथे बंटवारा. बात सोनाखान तीर ले शुरू होय रिहिस हे. जब ओ मालगुजार जेकर इहां चरचा करथन, तेकर रायपुर मंं तात्यापारा मं बने बड़ेक जनिक घर रिहिसे. ओ गउंटिया के बड़े बेटा रिसभ कुमार परगनिहा मोर संगवारी रिहिसे. ओकर घर के थोकर दुरिहा मं गोकुल परसाद टिकरिहा (सिलघट वाले, पूर्व सांसद श्रीमती छाया वर्मा) के मकान हे तिहां किराया मं राहत रेहेंव. एक दिन बड़े बिहनिया ओकर इहां बइठे ले गे रहेंव. बइठक मं तखत अउ कुरसी, टेबल लगे रिहिसे. अतके बेर पहाटनीन गरम-गरम चाहा अउ पिलेट मं बिस्कुट लान के टेबल मं मढ़ा के चल दिस. उही दिन सोनाखान ले ओ गउंटिया के जुन्ना सौंजिया आय राहय. मोला सुरता आवत हे, ओ दिन दशहरा के दिन परे रिहिसे धन का. ओ सौंजिया सियनहा अकन रिहिसे. अपन मालिक करा भेंट करे ले आय रिहिसे. अपन झोला ला सुदामा के लुकाय झोली ले धीरलगहा नवा धोती ला निकालथे अउ ओला ओकर कांध मं रखत पयलगी करथे, अतका बेर ओहर फफक के रो डरथे.

रिसभ दाऊ ओकर पीठ ल थपथवात कहिथे – काबर रोवत हस सौंजिया, अउ ये धोती मोला काबर देवत हस. अब तो मैं तोर मालिक नइ रहिगेंव, कोनो दूसर मालिक हे. जा ओकर सुआगत, मान-समनमान करबे.

ओ सौंजिया कहिथे- नहीं मालिक, मोर गरीब के ये छोटे ओनहा (कपड़ा भेंट) हे. जब कोनो कोती ले आबे तब हाथ-गोड़, मुंह,कान ल धो के , ओतके बेर पोंछ ले करबे l एला मंजूर कर ले मालिक, जिनगी भर तोर डेहरी मं नानपन ले काम करत आवत रेहेंव. अउ तोला भेंट करे के लइक मोर करा कांही नइहे. तोर पिंयार मोर सबले बड़े पूंजी हे, उही सुरता मं तोर करा खिंचे चले आय हौं.

अपन खीसा (जेब) ले अतके बेर रिसभ गउंटिया कड़कड़ावत तीन-चार ठन नोट निकालिस, कतका के रिहिसे तउन ला तो नइ जान पायेंव. सउंजिया ल जब ओकर हाथ मं धराय ले करथे तब ओहर ले बर मना कर देथे. अउ कहिथे- तोर परेम के आघू मं ए कागज के नोट के कोनो कीमत नइहे मालिक. ओकर आघू मं पांव तरी दंडाशरन होके फेर फफक के रो डरथे. गंउटिया ओला उठाथे अउ परेम से गला लगा लेथे. बहुत जिद करके नोट ला ओकर हाथ मं धराथे. टेबल मं माढ़े, चाय, बिस्कुट हमन ला देखते रहिगे के कतका बेर हमला खांही, पिही. ओ तो निच्चट जुड़ा के पानी हो जाय रहिथे. गउंटिया संगवारी ह पहाटनीन ला बलाके कहिथे- ए चाय, बिस्कुट ल ले जा अउ दूसर लान.

मालिक – नौकर के ये परेम, अइसन कहूं-कहूं मिलथे. आजकल के मालिक मन तो गररेता, बेइमान अउ दोगला होगे हे. नौकर के जउन वेतन, मजूरी जउन बनथे तउनो मं कैंची चलाय ले धरथे. न बने ढंग के वेतन दे ले धरय, न महंगाई भत्ता अउ ग्रेच्युटी. सब ला डकारे ले धर लेहें. खोखला परगे हे ओकर मन के पेट हा. कतको कमाही, लाखों, करोड़ों कमावत हें फेर खाता अइसे बनाके रखथे- कहिथे- दिवालिया होगे हन. बेइमानी के हद होगे हे. कतेक ल का बताबे ये देश मं बड़े-बड़े बेइमान अउ गररेता जनम धर के आय हें. मजदूर, नौकर ल देये बर सुक्खा हाथ झर्रा देथे अउ कहिथे- पइसा आही तउन दिन देबो. तुमन ला काम करना हे ते करौ, नइते नापव दूसर रस्दा. यहा बेरोजगारी के समे मं मिले नौकरी ल कोन लात मारही तेकर फायदा उठाथे बेइमान मन.

फेर अभी-अभी एक ठन खबर मिले हे के चेन्नई के एक झन उद्योगपति हे जेन ओकर करा काम करत रिहिन हे तेन कर्मचारी मन ला ग्रेड के मुताबिक देवारी तोहफा के रूप मं नवा-नवा कार अउ बाइक बांटे हे. अपन करमचारी मन के काम ल देखके ओहर खुश होगे हे. कहिथे- एमन मोर सुख-दुख के संगवारी हे. जउन दिन मुसीबत मं रेहेंव, बुरा हाल रिहिसे, कंपनी घाटा मं चलत रिहिन हे तभो ले एमन मोर संग ल नइ छोडिऩ, चाहतिन ते जा सकत रिहिन हे फेर नइ गिन. आज मोर दिन बहुरगे, सब इकरे परसादे हे तब ए बेटा मन ल ओकर मेहनत के फल देवत हौं, मैं मोर जेब ले उपराहा एको पइसा नइ देवत हौं. मोर घर ल एमन भरिन, आबाद करिन तब मोरो तो कुछु फरज बनथे. ओ पिंयार के, मेहनत के फल देवत हौं. परेम देबे त परेम मिलथे, बाढ़थे. अइसन मालिक अउ करमचारी (नौकर) आज के तारीख मं मिलना दुरलभ हे.

(परमानंद वर्मा छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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