पिथौरागढ़: कभी दिव्यांगों को हुनर सिखाती थी यह कर्मशाला, अब इस वजह से बंद होने के कगार पर

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हिमांशु जोशी

पिथौरागढ़. उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिला के दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाने के मकसद से वर्ष 1984 में खोली गई दिव्यांग कर्मशाला में पिछले दो साल से कोई प्रशिक्षण शुरू नहीं हो सका है. पिथौरागढ़ के दिव्यांग इस कर्मशाला में प्रशिक्षण लेने के इंतजार में भटक रहे हैं. समाज कल्याण विभाग के द्वारा चलाए जाने वाली दिव्यांग कर्मशाला अब स्थायी रूप से बंद होने के कगार पर है. इसकी वजह है दिव्यांगों को प्रशिक्षण देने के लिए प्रशिक्षक की कमी. अभी इस कार्यशाला में मात्र एक ही व्यक्ति कार्य कर रहे हैं.

यह हाल सिर्फ पिथौरागढ़ का ही नहीं, बल्कि प्रदेश के अन्य पहाड़ी जिलों का भी है. पिथौरागढ़ के अलावा हल्द्वानी और टिहरी में भी दिव्यांगजनों को प्रशिक्षण देकर उन्हें रोजगार से जोड़ने के मकसद से बनाई गई इन कार्यशाला से अब संबंधित विभाग ने किनारा कर लिया है, जबकि दिव्यांगों के नाम का बजट विभाग के पास पर्याप्त है. उसके बाद भी अभी तक समाज कल्याण विभाग इन कार्यशालाओं में प्रशिक्षक की तैनाती नहीं कर पाया है, जिससे दिव्यांग और असहाय हो गए हैं. उनके सामने अपना भरण-पोषण करने की आखिरी उम्मीद भी खत्म हो रही है.

जिले के कुमौड़ इलाके में स्थित इस कर्मशाला का जब न्यूज 18 लोकल ने जायजा लिया तो पता चला कि ऐसे कई दिव्यांग हैं, जो यहां से प्रशिक्षण लेकर अपना रोजगार चला रहे हैं और कई ऐसे हैं, जो इस कार्यशाला के शुरू होने का इंतजार कर रहे हैं. ऐसे ही एक दिव्यांग त्रिलोक कुमार से हमारी मुलाकात हुई जो रोज शहर में आकर आजीविका चलाने के लिए काम ढूंढ रहे हैं. उनका कहना है कि कुछ साल पहले उन्होंने इस कार्यशाला में प्रशिक्षण लिया था, लेकिन अब बदलते वक्त के साथ टेक्निकल चीजों का रुझान बढ़ा है और वो टेक्निकल चीजों का प्रशिक्षण लेना चाहते हैं जिसकी आखिरी उम्मीद उन्हें इस कार्यशाला से थी, लेकिन यहां कोई व्यवस्था न होने के कारण उन्हें इधर-उधर भटकना पड़ रहा है. उन्होंने विभाग से दिव्यांगों की मजबूरी समझते हुए जल्द इसे शुरू करने की मांग की है.

इस संबंध में जब समाज कल्याण विभाग से जानकारी ली गई तो उसने बताया कि कोरोना काल में इस कार्यशाला को प्रशिक्षकों की कमी के चलते बंद करने का आदेश उन्हें निदेशालय से मिला था. अभी भी यहां प्रशिक्षक का इंतजार है, जिसकी नियुक्ति भी शासन स्तर से होनी है. इसके लिए निदेशालय को पत्र भेजा गया था, लेकिन लंबे समय से इस संबंध में कोई जवाब नहीं आया है. अब इन सब कारणों से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि शासन में उच्च स्तर पर बैठे लोगों को उत्तराखंड के दिव्यांगों के प्रति कितनी संवेदनाएं हैं.

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