लोग क्यों कहते हैं यहां चमत्कार होते हैं? महात्माओं की समाधियों वाले हिंगवा की अनसुनी कहानी, सच या अंधविश्वास?

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रिपोर्ट – पुष्पेंद्र मीना

दौसा. अनेक धार्मिक स्थानों से जुड़ी मान्यताएं प्रचलित होती हैं. दौसा ज़िले में भी ऐसे अनेक धर्मस्थल हैं, जिनकी अपनी पहचान और इतिहास है. इन सबके बीच एक स्थान ऐसा है, जिसके साथ कई तरह की मान्यताएं और विश्वास जुड़े हुए हैं. ज़िले में स्थित मेहंदीपुर बालाजी धाम से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर हिंगवा गांव में नाथ समाज की प्रमुख गद्दी रखी हुई है. बताते हैं कि यहां कई संत महात्मा रहे हैं. स्थानीय लोग बताते हैं कि कैसे यहां करीब 6 महात्माओं ने जीते जी ही समाधि ली और यह भी यहां किस तरह के चमत्कारों पर लोग विश्वास करते हैं.

हिंगवा नाथ समाज की आसन गद्दी पर विराजमान लक्ष्मण दास महाराज के शिष्य योगी रामेश्वर नाथ इस स्थान को महत्वपूर्ण बताते हुए कहते हैं महाभारत के युद्ध से पहले ही पता लग गया था कि यहां युद्ध होने वाला है. तभी वहां से चलकर बाबा थलनाथ महाराज हिंगवा आए थे और यहां उन्होंने अपना एक धूना लगाकर आसन जमाया. उस समय यहां गांव नहीं, चारों तरफ जंगल ही जंगल था. योगी रामेश्वर ने बताया कि यहां सबसे पहले एक धूना और शिवलिंग स्थापित किया गया. यहां शिवलिंग की पूजा अब तक की जा रही है.

1800 साल पहले कैसे बना मंदिर?

हिंगवा के पटेल जलधारी मीणा बताते हैं जयपुर के राजा सवाई मानसिंह करीब 1800 वर्ष पहले यहां दर्शन करने आए थे. तब उन्होंने इस मंदिर का निर्माण करवाना शुरू किया गया था. लेकिन मंदिर निर्माण एक बार में पूरा नहीं हुआ. कई बार में अलग-अलग भाग में इस मंदिर का वर्तमान स्वरूप बन सका. वहीं योगी रामेश्वर ने बताया कि राजस्थान की पहली नाथ समाज की पीर गद्दी गांव में स्थापित है. देश और प्रदेश के नाथ समाज के लोग यहां आकर दर्शन करते हैं. अब आपको बताते हैं इस स्थान से किस तरह के चमत्कारों की बातें जुड़ी हैं.

जयपुर से बिना घोड़े के आया था रथ!

स्थानीय ग्रामीण कन्हैया मीणा का कहना है कि यहां के बाबा किशननाथ महाराज जयपुर के राजा के पास गए थे. तब उन्हें रथ पसंद आ गया. उन्होंने राजा से कहा यह रात को वह लेकर जाएंगे. इस पर राजा ने कहा कि रथ ले जाइए पर रथ ले जाने के लिए घोड़े नहीं हैं. अविश्वसनीय बात यह हुई कि महाराज रथ पर सवार हो गए और रथ से कहा अब आप चलिए हिंगवा गांव. बिना घोड़े के रथ जयपुर से सीधे हिंगवा आकर रुका. वह रथ आज भी मंदिर के अंदर रखा है.

समाधि का एक रोचक किस्सा

रामेश्वर नाथ के अनुसार इस गद्दी पर कई महाराज रहे हैं. जिनमें छह महाराजाओं ने जीवित रहते ही समाधि ली. यहां 58 समाधि स्थल बने हुए हैं. नाथ ने बताया इनमें सुजान नाथ महाराज ने सबसे पहले समाधि ली थी, जो यहां से समाधि लेकर सबसे पहले कालवान गांव में जाकर निकले, तो लोगों से पूछा यह कौन सा गांव है! सबने बताया कि यह तो कालवान गांव है, तो दोबारा वहां से ज़मीन के अंदर ही समाधि ली और फिर वह हिंगवा गांव के पहाड़ के पास निकले. यहां आज भी लोग पूजा करते हैं.

गंगा स्नान के समय की भविष्यवाणी की कहानी

कन्नू राम और बाबूलाल मीणा ने बताया काफी साल पहले उनका गांव गंगा स्नान के लिए गया था. गंगा में स्नान करते समय यहां के महाराज ने गांव में जोरदार ओलावृष्टि की भविष्यवाणी की. डरे हुए ग्रामीणों ने फसल बचाने की गुहार लगाई तो महाराज ने चमत्कार किया! दोनों बताते हैं कि इनाम में मिली मंदिर की ज़मीन पर ही सारे ओले महाराज जी ने बरसवा दिए. गांव में ओले और कहीं नहीं गिरे. इस चमत्कार को गांव के लोग आज भी मानते हैं और अब भी गांव से फसल के बाजरे और गेहूं को महाराज के यहां पहुंचाया जाता है.

जब पानी में तल गए पुए!

विजय नाथ महाराज ने बताया कि जब दूतनाथ महाराज के भंडारे का आयोजन था, तब अचानक रात के समय घी खत्म हो गया था. गद्दी पर विराजे महाराज ने कहा ऐसा करो जितना घी चाहिए उतना कुएं से पानी ले लो और पानी में पुआ उतार दो. लोगों ने ऐसा ही किया और कमाल यह हुआ कि पानी में उतारे गए पुआ भी घी में तले पुआ जैसे स्वादिष्ट बने. जब दिन हुआ तब जितना पानी कुएं से लिया गया था, उतना ही घी कुएं में डाला गया था.

न्यूज़18 इस कहानी के तथ्यों को प्रमाणित या पुष्ट नहीं करता है. यह स्थानीय मान्यताओं एवं विश्वासों पर आधारित फैक्ट्स हैं, इनके वैज्ञानिक आधार पुष्ट नहीं किए गए हैं.

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