Deoghar: कभी करते थे मजदूरी, अब प्रियरंजन बने कपड़े की फैक्ट्री के मालिक, दूसरों को दे रहे रोजगार

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रिपोर्ट: परमजीत कुमार

देवघर. कहा जाता है कि एक आइडिया इंसान के जीवन को बदल सकता है. बशर्ते उस पर अमल कर सही दिशा में लगातार मेहनत की जाए. ऐसा ही एक उदाहरण देवघर के जरुवाडीह गांव में देखने को मिल रहा है. कभी रोजगार के लिए खुद वर्षों दूसरे प्रदेश में रहे प्रियरंजन झा ने गांव में करीब दर्जनभर लोगों को रोजगार दिया है. दरअसल प्रियरंजन लुधियाना में कपड़े की फैक्ट्री में काम किया करते थे. एक दिन उनके मन में विचार आया कि क्यों ने ऐसी फैक्ट्री गांव में ही खोल दी जाए.

इसके बाद प्रियरंजन ने अपनी जमा पूंजी व रिश्तेदारों से आर्थिक मदद लेकर साल 2018 में कपड़े सिलने वाली दो मशीनें खरीदी. वह देवघर के बाजार से ऑर्डर लाते हैं, तो कोलकाता और लुधियाना से कच्चा माल मंगाकर कॉटन व सिंथेटिक कपड़ों के टी शर्ट, पजामा, हाफ पेंट आदि तैयार कर सप्लाई करते हैं. धीरे-धीरे काम बढ़ा तो बैंक से भी लोन मिला. उस पैसे से कुछ और मशीन खरीदकर गांव के लोगों को काम पर रख लिया. काम करने के लिए एक कमरे का निर्माण कराया. अब फैक्ट्री का माल अब देवघर के साथ-साथ दुमका, गोड्डा व गिरिडीह भी जाने लगा है.

19 साल किया बाहर में काम, लेकिन…
प्रियरंजन झा ने न्यूज़ 18 लोकल को बताया कि 19 साल की उम्र में 1999 में रोजगार के लिए घर छोड़ना पड़ा था. लुधियाना में एक कपड़े की फैक्ट्री में काम सीखा और वहीं नौकरी करने लगा. इस तरह 19 साल निकल गए. इस बीच में मन में अपना व्यापार शुरू करने का विचार आता था, लेकिन क्या किया जाए, ये समझ नहीं आता था. एक दिन ख्याल आया कि जो काम कर रहा हूं, उसी को गांव में शुरू किया जाए. इसके बाद इस काम की शुरुआत हुई. साथ ही कहा कि लुधियाना में महीने में 12 से 15 हजार रुपये कमाते थे. अब उनकी फैक्ट्री पर गांव के दर्जनभर लोग काम करते हैं और घर में रहकर 15 से 17 हजार रुपये महीने का कमा लेते हैं.

घर में रहकर हो रही कमाई
फैक्ट्री पर काम कर रहे दीपक कुमार ने बताया कि वे जरुवाडीह गांव के रहने वाले हैं. पहले दिल्ली में काम किया करते थे. अब गांव में फैक्ट्री खुल गई है, तो यहीं रोजगार मिल गया है. दिल्ली में महीने में 12 हजार रुपये कमाई होती थी, लेकिन बामुश्किल 7 से 8 हजार रुपये ही बच पाते थे. यहां काम करने पर 15 से 17 रुपये महीने के हो जाते हैं.

गांव की महिलाएं हो रहीं आत्मनिर्भर
वहीं, सिलाई मशीन पर बैठी सावित्री देवी ने बताया कि वे पहले गृहिणी थी. प्रियरंजन ने उन्हें ना सिर्फ रोजगार दिया बल्कि काम भी सिखाया. आज वह रोजाना 500 से 600 रुपये कमा लेती हैं. उन्होंने बताया कि घर की माली हालत ठीक नहीं थी. चाहकर भी कुछ कर नहीं सक रही थी. आज खुद की कमाई से बच्चों को इंग्लिश मिडियम स्कूल में पढ़ाती है. वे गांव की अन्य महिलाओं को भी काम करने के लिए प्रेरित करती हैं. उनके कहने पर 2-3 महिलाएं फैक्ट्री से जुड़ी भी हैं.

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