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Tuesday, January 31, 2023
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    Guilty Minds Review: लीगल ड्रामा बनाना हमारे बस की बात है नहीं

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    Review: कानूनी केस या किसी लीगल विषय पर एक वेब सीरीज बनाना बड़ा ही दुरूह कार्य माना जाता है. पहले भी टेलीविजन पर कई बार कोशिश की जा चुकी है जिसमें वकील दरअसल जासूस का काम करते हुए दिखाया जाता है और वकालत तो बस केस के निपटारे के लिए की जाती है. दूसरी समस्या ये भी है कि अदालत की अंदरूनी कार्यवाही बिलकुल ही ग्लैमरस नहीं होती. फिल्मों में जिस तरह दिखाई जाती है वो तो कतई नहीं होती. जज के सामने ढेरों मुकदमे होते हैं जिसमें कुछ तो सही होते कुछ निहायत ही फालतू और कुछ मुकदमों को क्यों किया गया है ये ही सवालों के कटघरे में रखा जाना चाहिए. जज के पास ये सुविधा नहीं होती कि वो किसी केस को सुने ही नहीं बस वो तारीख के मामले में थोड़ा बहुत हस्तक्षेप रखता है. मुकदमों की असलियत में जज के सामने कई बार कठिन सवाल खड़े होते हैं, सबूतों का अभाव, बचाव पक्ष के वकील द्वारा आधा अधूरा ज्ञान प्रस्तुत कर के मुकदमे को कमज़ोर कर देना और कई बार घाघ और चतुर किस्म के वकीलों की वजह से मुक़दमे का मूल उद्देश्य से भटक जाना. ऐसी कई मुकदमें हैं जिनका कुछ नहीं हो पा रहा है और बरसों से आरोपी या तो बाहर हैं या फिर सज़ा पूरी कर के भी जेल में बंद हैं. अमेज़ॉन प्राइम वीडियो की ताजातरीन वेब सीरीज गिल्टी माइंड्स एक ठीक ठाक प्रयास है वकीलों के नज़रिये से अदालतों की दुनिया देखने का. चिरपरिचित फॉर्मूले इसमें भी हैं लेकिन कोर्ट के भीतर की गतिविधियां और जज को नाटकीय नहीं बना कर दर्शकों पर बड़ा एहसान किया गया है.

    गिल्टी माइंड्स में कुल जमा 10 एपिसोड हैं. तकरीबन हर एपिसोड 50 मिनट लम्बा है तो एक साथ देखने की गलती मत करिये, एक एक कर के भी देखेंगे तो बहुत फर्क नहीं आएगा क्योंकि हर एपिसोड में एक नया केस ही लिया गया है. केसेस इस बार नए किस्म के हैं. कंसेंट यानि सहमति, वीडियो गेम के प्रभाव में की गयी अनजान शख्स की हत्या, कॉर्पोरेट कंपनियों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, आईवीएफ कंपनियों की अंदरूनी राजनीति, डेटिंग एप्स के ज़रिये होने वाले काण्ड और कुछ इसी तरह के विषयों को रखा गया है. दुर्भाग्य ये है कि श्रिया पिलगांवकर और सुगंधा गर्ग जो कि वकील की भूमिका में हैं, हर तरह के केस लड़ती हुई नजर आती हैं जो कि सामान्य तौर पर होता नहीं है. फौजदारी के मुकदमे लड़ने के लिए अलग वकील होते हैं, दीवानी के मामलों के लिए अलग वकील, कॉर्पोरेट लॉ के केसेस अलग वकील लड़ते हैं और आर्बिट्रेशन के वकील अलग. अच्छी बात ये है कि सभी केसेस बहुत अलग अलग तरह के हैं इसलिए कुछ केसेस में प्रतिपक्ष के वकील भी नए हैं जिस वजह से केस अलग अलग नजर आते हैं.

    अभिनय के मामले में दो पुराने धुरंधर सतीश कौशिक और कुलभूषण खरबंदा को देख के अच्छा तो लगता ही है लेकिन जिस तरह से उनका अनुभव पूरे सीन पर भारी पड़ता है वो अपने आप में एक लाजवाब मिसाल है. श्रिया पिलगांवकर किसी किसी एपिसोड में बहुत अच्छा अभिनय करती हैं और किसी किसी में उनका रंग फीका रह जाता है. उनकी सहकर्मी सुगंधा गर्ग को लेस्बियन बनाये बगैर भी काम चल सकता था, ऐसा लगता है कि कुछ अलग किरदार रचने की दौड़ वहीँ तक जा पाती है. सुगंधा हैं तो अच्छी अभिनेत्री मगर अभी पूरा एपिसोड खींच सकें ये संभव नहीं है. श्रिया के पूर्व प्रेमी और किसी किसी मुक़दमे में उनके विरोधी वरुण मित्रा का अभिनय काफी प्रभावित करता है. उनके करियर का ये सबसे बड़ा रोल है. इसके पहले वो जलेबी नाम की फिल्म में नज़र आये थे, रिया चक्रवर्ती के साथ. इसके आगे उन्हें कुछ बिलकुल अलग करना होगा तभी उन्हें नोटिस किया जा सकेगा. गिरीश कुलकर्णी, सानंद वर्मा और अतुल कुमार जैसे धाकड़ अभिनेता भी बीच बीच में नजर आते हैं और हर एपिसोड की धारा बदल ही देते हैं हालाँकि ये एक एक एपिसोड के ही मेहमान हैं.

    इस सीरीज के लेखन में काफी सावधानी बरती गयी है. मानव भूषण, शेफाली भूषण, दीक्षा गुजराल और जयंत दिगंबर सोमालकर ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि अदालत फ़िल्मी नहीं होने पाए. ‘रुक जाइये जज साहब’, या ‘तारीख पर तारीख’ या फिर ‘नहीं मानता मैं इस फैसले को’ जैसे फ़िल्मी डायलॉग नहीं हैं. जज साहब भी ताजीरात-ए-हिंद की दफाएं नहीं सुनाते और ना ही वो ऑर्डर ऑर्डर चिल्लाते रहते हैं. निर्देशिका शेफाली भूषण और उनके सह निर्देशक जयंत सोमालकर इस बात के लिए तारीफ के हक़दार हैं कि उन्होंने अदालत के सेट के आकार प्रकार तक पर नियंत्रण रखा है. हर केस अलग अलग अदालत में लगता है, हर बार वकील और जज अलग होते हैं और हर अदालत का सेट अलग है, जज की भाषा और बोलने का तरीका अलग है. कई बार जज का बोलना किसी असली अदालत की याद दिलाता है जहां जज भी दिन भर बेतुके केसेस को सुनते सुनते पक जाते हैं और फिर कोई न कोई डांट खा जाता है. वकील की अधूरी तयारी पर वकील को, गवाहों की बेवकूफाना बयानों पर गवाह को और कभी कभी उपस्थित जनता को भी डांट पड़ जाती है. ऑस्कर के लिए नामांकित मराठी फिल्म ‘कोर्ट’ में जिस तरह कोर्ट दिखाया गया है उस से प्रेरणा ली गयी है, ऐसा लगता है.

    वेब सीरीज देखने लायक है. हालांकि ओटीटी के चाहने वालों ने अंग्रेजी वेब सीरीज सूट्स, हाउ टू गेट अवे विथ मर्डर, बॉस्टन लीगल जैसी कई वेब सीरीज में कानून और कानूनी दाव पेंचों की खूबसूरत लड़ाई देख रखी हो तो गिल्टी माइंड्स उन्हें धीमा और कम ग्लैमरस लगेगा. लॉ फर्म या वकील की ज़िन्दगी पर हम ‘अदालत’, ‘क्रिमिनल जस्टिस’ या ‘योर हॉनर’ जैसी वेब सीरीज देखते हैं जो बड़ी ही फ़िल्मी तरीके से बनायीं गयी होती हैं या फिर ‘जॉली एलएलबी’, ‘बदला’ या ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी फिल्में जिसमें अतिरेक होना जरूरी माना जाता है. ‘गिल्टी माइंड्स’ पहला कदम है एक अच्छी लीगल वेब सीरीज की तरफ, उम्मीद है कि आगे और भी बेहतर काम देखने को मिलेगा, शायद इसी के अगले सीजन में.

    डिटेल्ड रेटिंग

    कहानी :
    स्क्रिनप्ल :
    डायरेक्शन :
    संगीत :

    Tags: Amazon Prime Video, Film review

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