Nainital: जलवायु परिवर्तन का पहाड़ों पर असर, देरी से शुरू हो रही सर्दी, जल्दी पक रहे फल

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रिपोर्ट : हिमांशु जोशी

नैनीताल. उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का असर देखने को मिल रहा है. जहां एक तरफ ग्लोबल वार्मिंग लगातार बढ़ रही है, तो वहीं ऐसा जान पड़ता है कि सभी मौसम एक महीना आगे खिसक गए हैं. मॉनसून सीजन में होने वाली बारिश कम हो गई है और फसलों की पैदावार के समय में भी अंतर आने लगा है. जलवायु परिवर्तन का मतलब है किसी एक क्षेत्र में समय के साथ होने वाले क्लाइमेट में बदलाव होना.

एरीज के पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ नरेंद्र सिंह ने बताया कि नैनीताल में वाहनों की संख्या बढ़ने से यहां के वायुमंडल में बहुत फर्क पड़ा है. मौसम के जानकार और नैनीताल के स्थानीय निवासी रमेश चंद्रा ने बताया कि नैनीताल में आनेवाली गाड़ियों की संख्या में लगातार बढ़त हो रही है. इन गाड़ियों से काफी ज्यादा मात्रा में कार्बन निकलता है.

दो साल पहले आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एरीज) के शोध के अनुसार, पर्वतीय क्षेत्रों में कार्बन की मात्रा में 30 फीसदी तक इजाफा हुआ है. इसके साथ ही यहां पीएम2.5 और पीएम10 की मात्रा भी धीरे-धीरे बढ़ रही है. इस वजह से जलवायु पर असर पड़ना ही है और यह देखा भी जा सकता है. बता दें कि PM10 में निर्माण स्थलों, लैंडफिल, कृषि, जंगल की आग, कचरा जलाने, औद्योगिक स्रोतों और खुली भूमि से हवा में उड़ने वाली धूल, पराग और बैक्टीरिया के टुकड़े शामिल होते हैं.

सरोवर नगरी नैनीताल में जहां 15 सितंबर से ठंड शुरू हो जाया करती थी, वहीं अब नवंबर में जाकर ठंड शुरू हो रही है. दोपहर में वातावरण में कार्बन के पार्टिकल होने की वजह से तेजी से तापमान में बढ़त हो रही है, तो वहीं रात में तापमान में उतनी ही तेजी से गिरावट देखने को मिल रही है. पहाड़ में होने वाले क्लाइमेट चेंज का असर यहां होने वाले फल-फूलों पर भी देखने को मिल रहा है. पेड़ से पतझड़ अक्टूबर में हो जाया करता था, वह वर्तमान में नवंबर-दिसंबर के महीने में देखने को मिल रहा है. दिसंबर में होने वाले फलों की पैदावार अब अक्टूबर-नवंबर में देखने को मिल रही है. रमेश चंद्रा ने बताया कि बीते 100 वर्षों में नैनीताल के औसतन तापमान में 10 डिग्री की बढ़त देखी गई है, जो भविष्य के लिए खतरे की घंटी है.

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