Water chestnut: दूर-दूर तक मशहूर हैं करौली के सिंघाड़े, रसमलाई जैसी मिठास!

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रिपोर्ट- मोहित शर्मा

करौली: आमतौर पर सिंघाड़े की फसल तालाबों और नदियों में होती है. जिसके चलते इस फसल के मौसम के आते ही करौली के सभी बड़े एवं छोटे तालाबों में इस फसल की बुवाई चालू हो जाती है. क्षेत्र में अच्छी वर्षा होने के कारण करौली के सभी तालाबों में सिंघाड़े की पैदावार काफी अच्छी मात्रा में हो रही है. जिसके कारण इस बार सिंघाड़े की फसल से जुड़े हुए किसान भी खुश नजर आ रहे हैं. करौली में सिंघाड़े की फसल और इसके व्यापार से कहार जाति के लोग जुड़े हुए हैं.

सिंघाड़े की मिठास के दूर-दूर तक के लोग दीवाने
वैसे तो अक्सर सिंघाड़े की फसल राजस्थान के कई क्षेत्रों में होती है लेकिन इसमें करौली क्षेत्र की बात करें तो पूरे संभाग में सिंघाड़े का सबसे ज्यादा उत्पादन करौली क्षेत्र में होता है. यहां का सिंघाड़ा अपनी मिठास के कारण मशहूर है. मीठा और स्वादिष्ट सिंगाड़ा होने के कारण इस सिंघाड़े के दूर दूर तक के लोग दीवाने हैं. जिसके कारण यह सिंघाड़ा राजस्थान सहित कई शहरों में बिकने जाता है.

जानिए कब होती है इसकी फसल
सिंघाड़ा उत्पादक किसान रमेश कश्यप ने बताया कि अगस्त माह में इसकी फसल को तालाबों में रोपा जाता है. कड़ी मेहनत और देखभाल के बाद करीब 4 महीने में यह ऋतु फल तैयार होता है. इसके बाद यह बाजार में बिकने जाता है. सिंघाड़ा उत्पादन में काफी मेहनत लगती है. सिंघाड़े की खेती और व्यापार से करौली में कहार जाति के करीब 5000 लोग जुड़े हुए हैं.

करौली का सिंघाड़ा मीठा होने के कारण यह काफी मात्रा में बिकता है. सिंघाड़ा व्यापारी संजय कश्यप ने बताया कि यह सिंघाड़ा दिसंबर माह तक बाजार में चलता है. प्रतिदिन करौली में 500 क्विंटल सिंघाड़े का कारोबार होता है. यह मीठा सिंघाड़ा रणगमां ताल, सैलोवर, मासलपुर के सागर, कुडगांव और ससेड़ी के तालाब में होता है.

जानिए क्या है इसके फायदे
पानी में होने वाले इस फल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह शरीर में पानी की पूर्ति करता है. इसमें कैल्शियम भी भरपूर मात्रा में पाया जाता है. इसके सेवन से हड्डियां और दांत मजबूत होते हैं. सिंघाड़ा शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है इसलिए इसका सबसे ज्यादा सेवन करौली में व्रत के खाने में किया जाता है.

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